नई दिल्ली। निर्देशक पल्लवी रॉय की फिल्म ‘साँवरी’, जिसने पेरिस से लेकर अमेरिका, टोरंटो और ताइवान तक के फिल्म फेस्टिवल्स में सम्मान और सराहना बटोरी, अब STAGE पर राजस्थानी, हरियाणवी और भोजपुरी समेत कई भाषाओं में दर्शकों तक पहुँच रही है। पेरिस इंटरनेशनल फिल्म अवॉर्ड्स में पल्लवी रॉय को बेस्ट डायरेक्टर का सम्मान मिला, जबकि फिल्म ने अमेरिका के मर्सेड क्वीयर फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म और नॉर्थईस्ट इंडिया इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट LGBTQ फिल्म का अवॉर्ड जीता।
राजस्थान के ग्रामीण परिवेश में बुनी यह फिल्म एक ऐसे आदमी की कहानी है, जो अकेलेपन से हारकर एक दुल्हन ख़रीदता है, और बदले में उसे मिलती है साँवरी, एक ट्रांसजेंडर-इंटरसेक्स इंसान। यहीं से शुरू होती है एक प्रेम कहानी, जिसे समाज न समझना चाहता है, न सहना।
एक कहानी, जो रेत में दबी रह जाती
राजस्थान के एक गाँव में भँवर रहता है, सीधा-सादा, चुप, और अपने दबंग चाचा भैरो की परछाईं में दबा हुआ। घर में औरत नहीं है, और गाँव में ब्याहने लायक़ लड़कियाँ कम हैं। चाचा उसे समझाता है कि दुल्हन ख़रीद ली जाए। भँवर अपनी ज़मीन बेच देता है।
लेकिन दलाल धोखा देता है। जो ‘दुल्हन’ घर आती है, वह साँवरी है — एक ऐसी इंसान, जिसकी पहचान औरत की है, पर जिसे समाज ‘छक्का’, ‘गुड़’ और ‘हिजड़ा’ जैसे शब्दों से नवाज़ता आया है। भँवर और भैरो उसका सच छिपाकर उसे घर के कामकाज के लिए रख लेते हैं।
और फिर वह होता है, जो किसी ने नहीं सोचा था। साँवरी की नर्मी और उसकी मीठी तबीयत धीरे-धीरे भँवर के दिल को पिघला देती है। पर भैरो की नज़र में साँवरी इंसान नहीं, एक चीज़ है। जब भँवर उसके लिए खड़ा होता है, तो घर में तनाव फूटता है और साँवरी का सच गाँव के सामने आ जाता है। अब सवाल यह है। क्या प्रेम उस समाज के फ़ैसले से बड़ा हो सकता है, जो पहले से तय कर चुका है कि कौन इंसान है और कौन नहीं?
पल्लवी रॉय: जिन्होंने चुप्पी को आवाज़ दी
‘साँवरी’ का निर्देशन पल्लवी रॉय ने किया है, और इसकी पटकथा उन्होंने सुशील शर्मन के साथ मिलकर लिखी है। गुंजन गोयल ने हैशटैग फिल्म्स LLP के बैनर तले फिल्म का निर्माण किया है।
पल्लवी ने एक साथ कई ऐसे विषयों को छुआ, जिन पर मुख्यधारा का सिनेमा अक्सर चुप रहता है। दुल्हनों की ख़रीद-फ़रोख़्त, देश के कुछ हिस्सों में बिगड़ा लिंगानुपात, ट्रांसजेंडर और इंटरसेक्स लोगों के साथ होने वाला अपमान, और यह भी कि सामाजिक दबाव का बोझ सिर्फ़ औरतें नहीं, मर्द भी उठाते हैं। फिल्म की ख़ूबी यह है कि वह इन सवालों को उपदेश की तरह नहीं, एक प्रेम कहानी की तरह कहती है।
ओसियाँ की रेत, असली चेहरे
फिल्म की शूटिंग जोधपुर के पास ओसियाँ में हुई — वह जगह, जहाँ रेत के धोरे और पुराने मंदिर मिलकर एक ऐसा कैनवास बनाते हैं, जिस पर अकेलापन और प्रेम, दोनों गहरे रंग में उभरते हैं।
साँवरी का किरदार कनक गर्ग ने निभाया है, भँवर बने हैं सार्थक नरूला, और भैरो के रूप में भगवान तिवारी हैं। करण मान और गिरीश पाल सिंह भी अहम भूमिकाओं में हैं। कनक गर्ग ने साँवरी की नर्मी और उसके भीतर के दर्द को जिस संयम से निभाया है, उसकी फेस्टिवल्स में ख़ास तौर पर चर्चा हुई।
पेरिस, टोरंटो, ताइवान: दुनिया ने सुनी साँवरी की आवाज़
रेत के एक गाँव की यह कहानी दुनिया के कई बड़े मंचों तक पहुँची। पेरिस इंटरनेशनल फिल्म अवॉर्ड्स में पल्लवी रॉय को बेस्ट डायरेक्टर चुना गया। अमेरिका के मर्सेड क्वीयर फिल्म फेस्टिवल में इसे बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म का अवॉर्ड मिला, और नॉर्थईस्ट इंडिया इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट LGBTQ फिल्म का। दक्षिण कोरिया के सियोल इंटरनेशनल मंथली फिल्म फेस्टिवल में फिल्म को विशेष उल्लेख मिला।
टोरंटो इंटरनेशनल विमेन फिल्म फेस्टिवल, ताइवान इंटरनेशनल क्वीयर फिल्म फेस्टिवल, मुंबई के KASHISH इंटरनेशनल क्वीयर फिल्म फेस्टिवल और LA इंडिपेंडेंट विमेन फिल्म अवॉर्ड्स में यह आधिकारिक रूप से चुनी गई। मई 2024 में होमोफोबिया, बाइफोबिया और ट्रांसफोबिया के विरोध के अंतरराष्ट्रीय दिवस (IDAHOBIT) पर दिल्ली के अलायंस फ्रांसेज़ में इसकी विशेष स्क्रीनिंग और चर्चा भी हुई।
फेस्टिवल की तालियों से अपने लोगों तक
फेस्टिवल्स की तालियाँ एक फिल्म को पहचान देती हैं, लेकिन उसकी असली मंज़िल वे लोग होते हैं, जिनकी ज़िंदगी से वह कहानी निकली है। ‘साँवरी’ के लिए वह मंज़िल राजस्थान के गाँव हैं, जहाँ भँवर जैसे लोग आज भी रहते हैं, और जहाँ साँवरी जैसी ज़िंदगियाँ आज भी छिपकर जी जाती हैं।
STAGE के ज़रिए अब यह फिल्म उन्हीं दर्शकों तक, उन्हीं की बोली में पहुँच रही है — राजस्थानी में भी, और हरियाणवी, भोजपुरी समेत दूसरी भाषाओं में भी। एक कहानी, जो कभी फेस्टिवल्स की चुनिंदा स्क्रीनों तक सीमित थी, अब किसी गाँव के मोबाइल पर, किसी परिवार के बीच बैठकर देखी जा सकती है। शायद यहीं से वह बातचीत शुरू हो, जिसे यह फिल्म शुरू करना चाहती है।
“साँवरी हर उस इंसान की कहानी है, जिसे समाज ने अधूरा कहा”
फिल्म की निर्देशक पल्लवी रॉय ने कहा,
साँवरी हर उस इंसान की कहानी है, जिसे समाज ने अधूरा कहकर किनारे कर दिया। पेरिस और टोरंटो में तालियाँ मिलीं, पर मेरा सपना था कि यह फिल्म राजस्थान के उन्हीं गाँवों तक पहुँचे, जहाँ से यह कहानी आई है। STAGE ने वह सपना पूरा किया है। अब यह फिल्म उन्हीं की बोली में उन तक पहुँच रही है, जिनसे यह सवाल पूछती है।
STAGE के सह-संस्थापक और CCO प्रवीण सिंघल ने कहा,
‘साँवरी’ जैसी फिल्में बताती हैं कि बोलियों का सिनेमा सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, समाज से ईमानदार बातचीत भी है। जिस फिल्म को दुनिया के फेस्टिवल्स ने सराहा, उसका असली हक़दार वह दर्शक है, जिसकी ज़मीन से यह कहानी निकली है। STAGE का मक़सद यही है कि ऐसी कहानियाँ अपने घर लौटें।”
STAGE के बारे में
STAGE भारत का पहला ‘बोली-फर्स्ट’ OTT प्लेटफॉर्म है, जिसकी शुरुआत 1 नवंबर 2019 को विनय सिंघल, प्रवीण सिंघल और शशांक वैष्णव ने की। नोएडा स्थित यह प्लेटफॉर्म हरियाणवी, राजस्थानी, भोजपुरी, गुजराती, मराठी, बांग्ला, पंजाबी और हिंदी में फिल्में, वेब सीरीज़, माइक्रोड्रामा, एनीमे और डॉक्यूमेंट्री उपलब्ध कराता है। इसकी लाइब्रेरी में 5,000 से ज़्यादा फिल्में और सीरीज़ हैं। ओलंपिक चैंपियन नीरज चोपड़ा और अभिनेता रणदीप हुड्डा STAGE के ब्रांड एम्बेसडर हैं। कंपनी नहीं, हम क्रांति हैं। अधिक जानकारी: www.stage.in