नई दिल्ली। एक तरफ दुनिया भर के फिल्म फेस्टिवल्स में तालियों की गूंज, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सम्मान और आलोचकों की सराहना, तो दूसरी तरफ अपने ही देश में आम दर्शकों तक पहुंचने की चुनौती। यह विडंबना भारतीय क्षेत्रीय और स्वतंत्र सिनेमा की उन फिल्मों के सामने अक्सर खड़ी होती रही है, जो दमदार कहानियों के बावजूद बड़े स्तर पर दर्शकों तक नहीं पहुंच पातीं। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। ओटीटी प्लेटफॉर्म STAGE ने राजस्थान की चार चर्चित फिल्मों ‘साँकल’, ‘खेजड़ी’, ‘साँवरी’ और ‘नाते’ को अपने प्लेटफॉर्म पर जगह देकर इन्हें नए दर्शकों तक पहुंचाने की पहल की है। ये फिल्में केवल मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि समाज की उन परंपराओं, कुप्रथाओं और सवालों को सामने लाती हैं, जिन पर मुख्यधारा का सिनेमा अक्सर खुलकर बात नहीं करता।
इन फिल्मों के विषय भले राजस्थान की मिट्टी से जुड़े हों, लेकिन इनकी कहानियां किसी एक राज्य की सीमा में बंधी नहीं हैं। STAGE के मुताबिक, इन फिल्मों को राजस्थान के अलावा हरियाणा, बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल और हिमाचल प्रदेश सहित देश के कुल 12 राज्यों में दर्शकों से सकारात्मक प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं।
फेस्टिवल्स में सम्मान मिला, लेकिन आम दर्शकों तक पहुंचना बड़ी चुनौती
भारतीय सिनेमा में हर साल कई ऐसी फिल्में बनती हैं, जो अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में अपनी पहचान बनाती हैं। कुछ पुरस्कार जीतती हैं, तो कुछ अपने संवेदनशील विषयों के कारण चर्चा बटोरती हैं। लेकिन फेस्टिवल की सफलता और आम दर्शकों तक पहुंच के बीच एक बड़ा फासला होता है। खासकर राजस्थानी जैसी क्षेत्रीय बोलियों में बनी फिल्मों के लिए बड़े स्तर पर थिएटर रिलीज़, वितरण और ओटीटी पर जगह हासिल करना आसान नहीं होता।
इसी फासले को कम करने की कोशिश STAGE अपने बोली-फर्स्ट मॉडल के ज़रिए कर रहा है। प्लेटफॉर्म उन कहानियों को प्राथमिकता दे रहा है, जो स्थानीय समाज, संस्कृति और वास्तविक जीवन के अनुभवों से निकली हैं।
ऑफ-बीट सिनेमा के लिए नया रास्ता खोल रहा STAGE
भारतीय ओटीटी इंडस्ट्री में लंबे समय तक बड़े सितारों, लोकप्रिय वेब सीरीज़ और मुख्यधारा के मनोरंजन पर ज़्यादा ध्यान दिया जाता रहा है। ऐसे में क्षेत्रीय बोली में बनी स्वतंत्र फिल्मों के लिए बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचना आसान नहीं था। STAGE का मॉडल इस दिशा में अलग रास्ता पेश करता है। प्लेटफॉर्म का उद्देश्य केवल क्षेत्रीय भाषाओं में मनोरंजन देना नहीं, बल्कि स्थानीय संस्कृति, सामाजिक विषयों और कम सुनी गई कहानियों को पहचान दिलाना भी है।
बाल विवाह जैसी कुप्रथा, लैंगिक पहचान, सामाजिक स्वीकार्यता और नाता प्रथा जैसे विषयों पर बनी इन फिल्मों को डिजिटल मंच मिलने से फिल्मकारों को नए दर्शक मिल रहे हैं, और दर्शकों को अपनी संस्कृति और समाज की अनकही कहानियों से जुड़ने का मौका।
STAGE के को-फाउंडर एवं चीफ कंटेंट ऑफिसर प्रवीण सिंघल ने कहा, “जो फिल्में दुनिया के बड़े फेस्टिवल्स में सम्मान पाती हैं, उन्हें अपनी ही मिट्टी के दर्शकों तक पहुंचने के लिए संघर्ष करना पड़े, यह हमारे सिनेमा की बड़ी विडंबना है। STAGE पर हमारा प्रयास ऐसी कहानियों को उनका सही दर्शक दिलाना है, और खुशी है कि राजस्थान की ये कहानियां आज 12 राज्यों तक पहुंच रही हैं।”
‘साँकल’: 45 इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल्स, 15 से ज्यादा अवॉर्ड्स और दो दशक से लंबा फिल्मी सफर
राजस्थान के कोटा से आने वाले फिल्मकार दैदीप्य जोशी ने 1992 में बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर अपने करियर की शुरुआत की और टेलीविज़न, डॉक्यूमेंट्री और विज्ञापन फिल्मों के क्षेत्र में लंबा समय बिताया। लेकिन उनके मन में राजस्थान की एक ऐसी सामाजिक कुप्रथा पर फिल्म बनाने की इच्छा थी, जिस पर समाज में खुलकर चर्चा कम होती थी। इसी सोच से ‘साँकल’ का जन्म हुआ।
फिल्म एक ऐसी युवती की कहानी है, जिसे परंपरा के नाम पर अपनी उम्र से बहुत छोटे लड़कों के साथ विवाह के बंधन में बांध दिया जाता है। फिल्म सामाजिक दबाव, स्त्री की स्वतंत्रता और परंपरा के नाम पर होने वाले अन्याय को संवेदनशील तरीके से सामने लाती है। अभिनेत्री तनिमा भट्टाचार्य ने फिल्म में अबीरा का किरदार निभाया है।
‘साँकल’ का 45 अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल्स में चयन हुआ और फिल्म ने 15 से अधिक पुरस्कार जीते। लखनऊ के शान-ए-अवध इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में इसे सर्वश्रेष्ठ फिल्म और दैदीप्य जोशी को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का सम्मान मिला, जबकि रशियन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में फिल्म ने बेस्ट फिल्म और बेस्ट एक्ट्रेस के पुरस्कार जीते। अमेरिका, कनाडा, रूस और बांग्लादेश के फिल्म समारोहों से होते हुए अब यह फिल्म STAGE के ज़रिए राजस्थान और देश के दूसरे हिस्सों के दर्शकों तक पहुंच रही है।
दैदीप्य जोशी के मुताबिक, ‘साँकल’ का विचार उन्हें 2005 में एक पत्रिका में छपे लेख को पढ़कर आया था। उन्होंने वह लेख सालों तक संभालकर रखा और बाद में जैसलमेर जाकर इस प्रथा के सामाजिक असर को करीब से समझा। फिल्म बनाने के लिए उन्होंने विज्ञापन फिल्मों से जुटाई अपनी बचत लगा दी।
दैदीप्य जोशी ने कहा, “यह फिल्म मेरे लिए सिर्फ एक प्रोजेक्ट नहीं, बरसों पुराना वादा थी। अपनी बचत लगाई, दोस्तों और साथियों ने हाथ थामा, तब जाकर ‘साँकल’ बन पाई। दुनिया भर में सम्मान मिला, लेकिन असली खुशी तब है जब राजस्थान के लोग इसे अपनी बोली में देखें।”
‘खेजड़ी’: टीवी के ‘राम’ आशीष शर्मा ने चुना एक चुनौतीपूर्ण किरदार, जर्मनी से न्यूयॉर्क तक मिली पहचान
‘सिया के राम’, ‘रंगरसिया’ और ‘चंद्रगुप्त मौर्य’ जैसे धारावाहिकों से घर-घर में पहचान बनाने वाले अभिनेता आशीष शर्मा ने ‘खेजड़ी’ के ज़रिए अपने अभिनय का बिल्कुल अलग पक्ष सामने रखा। यह फिल्म एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति की कहानी है, जिसकी पहचान को समाज स्वीकार करने के बजाय छिपाने की कोशिश करता है। फिल्म पहचान, सामाजिक भेदभाव, गरिमा और स्वीकार्यता जैसे सवाल उठाती है।
‘खेजड़ी’ आशीष शर्मा का बतौर निर्माता पहला प्रोजेक्ट था। उनकी पत्नी अर्चना शर्मा ने फिल्म के लेखन और निर्माण में अहम भूमिका निभाई, जबकि निर्देशन रोहित द्विवेदी ने किया।
साल 2018 में मुंबई के KASHISH इंटरनेशनल क्वीयर फिल्म फेस्टिवल में फिल्म का वर्ल्ड प्रीमियर हुआ। इसके बाद जर्मनी के कोलोन में होमोक्रोम फिल्मफेस्ट ने इसे अपनी ओपनिंग फिल्म चुना। झारखंड इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल और न्यूयॉर्क साउथ एशियन फिल्म फेस्टिवल में आशीष शर्मा को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला। इस साल राजस्थान फिल्म फेस्टिवल में भी फिल्म ने बेस्ट एक्टर और बेस्ट सिनेमैटोग्राफर के सम्मान जीते। STAGE ने नई दिल्ली में ‘खेजड़ी’ की विशेष स्क्रीनिंग भी आयोजित की, जिससे फिल्म के विषय पर चर्चा को नया मंच मिला।
इतनी अंतरराष्ट्रीय पहचान के बावजूद फिल्म का भारत में बड़े डिजिटल दर्शक वर्ग तक पहुंचना आसान नहीं रहा। आशीष के मुताबिक, फिल्म लेकर कई ओटीटी प्लेटफॉर्म्स से संपर्क किया गया, लेकिन लंबे समय तक बात आगे नहीं बढ़ सकी। STAGE पर रिलीज़ के साथ फिल्म को आखिरकार वह मंच मिला।
आशीष शर्मा ने कहा, “‘खेजड़ी’ मेरे करियर के सबसे चुनौतीपूर्ण अनुभवों में से एक रही। इस किरदार के लिए मुझे अपने भीतर बहुत कुछ बदलना पड़ा, और तैयारी के दौरान कई बार लगा कि शायद मैं इसे नहीं कर पाऊंगा। फिल्म में हमारी अपनी कमाई लगी थी, सीमित बजट था। अब STAGE पर इसे वो दर्शक मिल रहे हैं, जिनका हमें इंतज़ार था।”
‘साँवरी’: राजस्थान की रेत से पेरिस तक, महिला निर्देशक की कहानी ने जीते अंतरराष्ट्रीय सम्मान
राजस्थान के ओसियां की पृष्ठभूमि पर बनी ‘साँवरी’ प्रेम, पहचान, सामाजिक मान्यताओं और स्वीकार्यता पर आधारित एक संवेदनशील फिल्म है। फिल्म का निर्देशन पल्लवी रॉय शर्मा ने किया है, जिन्होंने सुशील शर्मन के साथ मिलकर इसकी कहानी लिखी। फिल्म के निर्माता गुंजन गोयल हैं। राजस्थान का ग्रामीण परिवेश, स्थानीय संस्कृति और मानवीय रिश्तों की जटिलताएं फिल्म में बेहद स्वाभाविक अंदाज़ में सामने आती हैं।
‘साँवरी’ की सबसे बड़ी उपलब्धि पेरिस इंटरनेशनल फिल्म अवॉर्ड्स में पल्लवी रॉय को मिला बेस्ट डायरेक्टर का सम्मान है। अमेरिका के मर्सेड क्वीयर फिल्म फेस्टिवल में फिल्म को बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म और नॉर्थईस्ट इंडिया इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट LGBTQ फिल्म का पुरस्कार मिला। टोरंटो इंटरनेशनल विमेन फिल्म फेस्टिवल और ताइवान इंटरनेशनल क्वीयर फिल्म फेस्टिवल में भी इसका आधिकारिक चयन हुआ। यह फिल्म इस बात का उदाहरण है कि क्षेत्रीय सिनेमा से आने वाली महिला फिल्मकार अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी मज़बूत पहचान बना रही हैं।
पल्लवी रॉय ने कहा, “फिल्मकार बनने का मेरा सफर लंबे इंतज़ार और लगातार मेहनत से भरा रहा। इस फिल्म की सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि संवेदनशील विषय को बिना उपदेश दिए कैसे कहा जाए। मैंने लोगों के असली अनुभवों को समझा, और जब फेस्टिवल्स में सराहना मिली, तो लगा कि मेहनत सही दिशा में थी।”
‘नाते’: नाता प्रथा पर सवाल उठाती फिल्म, समाज के सामने रखा कड़वा सच
निर्देशक श्याम उपाध्याय की फिल्म ‘नाते’ राजस्थान की नाता प्रथा के जटिल पहलुओं को सामने लाती है। फिल्म के केंद्र में एक ऐसी महिला है, जिसकी ज़िंदगी के बड़े फैसले सामाजिक परंपराओं और दूसरों की इच्छाओं के आधार पर लिए जाते हैं। फिल्म में आकांक्षा पाल, रशिका प्रधान, जयहिंद कुमार, शशि रंजन और दीपक बंधु अहम भूमिकाओं में हैं। राजस्थानी बोली और स्थानीय परिवेश इस कहानी को प्रामाणिक बनाते हैं।
फिल्म के निर्देशक श्याम उपाध्याय ने कहा, “हमारा उद्देश्य किसी समाज या परंपरा को गलत ठहराना नहीं, बल्कि उन हालात को सामने लाना है, जिनमें एक महिला की इच्छा और सम्मान पीछे छूट जाते हैं। STAGE के ज़रिए यह सवाल अब ज़्यादा घरों तक पहुंचेगा, यही हमारी सबसे बड़ी उम्मीद है।”
राजस्थान की कहानियां, लेकिन दर्शक पूरे देश में
इन चारों फिल्मों के STAGE पर आने के बाद एक अहम बात सामने आई है कि क्षेत्रीय सिनेमा की अपील केवल उसके मूल राज्य तक सीमित नहीं है। STAGE के आंतरिक आंकड़ों के अनुसार, इन राजस्थानी फिल्मों को देश के 12 राज्यों में दर्शक मिल रहे हैं। प्लेटफॉर्म के मुताबिक, इन फिल्मों ने नए सब्सक्राइबर्स को जोड़ने में भी योगदान दिया है।
जब कहानी का विषय दमदार हो, किरदार असल ज़िंदगी के करीब हों और भावनाएं सार्वभौमिक हों, तो भाषा और क्षेत्र की सीमाएं मायने नहीं रखतीं। यह रुझान बताता है कि स्वतंत्र, सामाजिक सरोकारों वाली और फेस्टिवल्स में सराही गई फिल्मों के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म पर एक बड़ा दर्शक वर्ग मौजूद है।
अंतरराष्ट्रीय पहचान से घरेलू दर्शकों तक
‘साँकल’ के 45 अंतरराष्ट्रीय फेस्टिवल्स और 15 से ज़्यादा अवॉर्ड्स, ‘खेजड़ी’ की जर्मनी और अमेरिका तक पहुंच और ‘साँवरी’ का पेरिस से टोरंटो तक का सफर बताता है कि राजस्थान की कहानियों में दुनिया को बांधने की ताकत है। वहीं ‘नाते’ जैसी फिल्म सामाजिक सवालों को स्थानीय दर्शकों के सामने रखती है। इन चारों फिल्मों की STAGE पर मौजूदगी इस बड़े बदलाव का संकेत है कि क्षेत्रीय सिनेमा अब फेस्टिवल्स और सीमित स्क्रीनिंग पर निर्भर रहने के बजाय डिजिटल मंच के ज़रिए अपने दर्शक खुद तलाश रहा है।